सब्जी खरीदते समय जाति नहीं देखी जाती मगर उसी सब्जी को खिलाते समय जाति
देखी जाती हैं।।
फसल कटाई पर जाति नहीं देखते मगर उसकी बनी रोटिया खिलाते
समय जाति देखी जाती हैं।।
मकान बनवाने के लिए जाति नहीं देखते मगर जब मकान
बन जाये तो उसमे बैठाने के लिए जाति देखते हैं।। मंदिर बनवाने के लिए जाति
नहीं देखते मगर उसमें जाने के लिए जाति देखते हैं।।
स्कूल या कॉलेज बनवाने
के लिए जाति नहीं देखते लेकिन पढ़ाई के वक़्त जाति देखी जाती हैं।।
कपडे
खरीदते समय जाति नहीं देखते मगर उन्ही कपड़ो को पहनकर उनसे
दूर भागते हैं। साथियो ये भारत देश हैं, जहाँ कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि
जाति व्यवस्था खत्म हो गई है। बुद्धिजीवियों का सामाजिक दायित्व... "इंसान
जीता है,पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंततः मर जाता हैं। जीता इसलिए है
ताकि कमा सके... कमाता इसलिए है ताकि खा सके... खाता इसलिए है ताकि जिन्दा
रह सके... लेकिन फिर भी एक दिन मर ही जाता है... अगर सिर्फ मरने के डर से
कमाकर खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जायेगी। मरना तो सबको
एक दिन हैं ही, नहीं तो समाज के लिए जियो, ज़िन्दगी का एक उद्देश्य बनाओं,
गुलामी की जंजीरो में जकड़े समाज को आज़ाद कराओं। अपना और अपने बच्चों का
भरण पोषण तो एक जानवर भी कर लेता हैं। मेरी नज़र में इंसान वही है जो समाज
की भी चिंता करे और समाज के लिये कार्य भी करे नहीं तो डूब मरे बेशक अगर
जिंदगी सिर्फ खुद के लिये ही जी रहे है तो"...

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