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Monday, March 7, 2016

नेताओं से बहुत दुखी है...

आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,
शैतानी शैतान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,
घोटालों की थाली में।
सूटकेश भर के चलते हैं,
अपने यहाँ दलाली में।।
देश-धर्म की नहीं है चिंता,
चिन्ता निज सन्तान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की !
भिखमंगों में गिनती कर दी,
भारत देश महान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
जनता केआवंटित धन को,
आधा मन्त्री खाते हैं।
बाकी में अफसर-ठेकेदार,
मिलकर मौज उड़ाते हैं।।
लूट-खसोट मचा रखी है,
सरकारी अनुदान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
थर्ड क्लास अफसर बन जाता,
फर्स्ट क्लास चपरासी है।
होशियार बच्चों के मन में,
छायी आज उदासी है।।
गंवार व्यक्ति तो नेता बन गया,
मेधावी आज खलासी है।
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,
शैतानी शैतान की।।
नेताओं से बहुत दुखी है,.
जनता हिन्दुस्तान की।।

Blaming others is excusing ourse

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये।
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥
कहते हैं मानव की सबसे बड़ी गलतफ़हमी है कि हर किसी को लगता है कि वो गलत नहीं है। यह दोहा हमारा व्यवहार हमें बता रहा है। जब भी हम दुखी होते हैं तो हमें लगता है कि हम फ़लाने व्यक्ति के कारण दुखी हैं.. उसने ऐसा कैसे कर दिया.. या ऐसा क्यों नहीं किया... या उसको वो करना चाहिये था। या परिस्थितियों को रोते हैं.. काश ऐसा हो जाता.. काश वैसा हो जाता.. वगैरह वगैरह। यह अमूमन हम सब करते हैं। यह मानवीय व्यवहार है। अपने दुख का दोषी किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को ठहराना। कभी क्रोध आ जाये तो हम उसका दोष भी किसी दूसरे को देते हैं। और हमें हमेशा लगता है कि हम सही हैं। हमसे कभी भूल नहीं हो सकती। ये हमारा अहं ही है जो हमे इस तरह सोचने पर मजबूर कर देता है। अपनी गलतियों का कारण हम दूसरों में खोजते हैं। नतीजा, हम किसी दूसरे की आलोचना करते हैं और उसे ही भला बुरा कहने लगते हैं।
कबीर कहते हैं कि क्यों व्यर्थ में हम किसी दूसरे में दोष ढूँढने लगते हैं? वे कहते हैं कि हमें अपने अंदर झाँक कर देखना चाहिये। यदि कहीं कोई कमी है तो वो "मुझमें" है। मैं किसी दूसरे व्यक्ति में गलतियाँ क्यों ढूँढू? यदि मैं किसी के साथ निभा नहीं पा रहा हूँ तो बदलाव मुझे करना है।
हाँ मैं यह जानता हूँ कि हर व्यक्ति चाहें वो हमेशा अच्छा लगे या बुरा, उसका प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। जिस व्यक्ति की आपसे नहीं निभती वही आपका व्यवहार की परीक्षा होती है कि आप उससे किस प्रकार बर्ताव करते हैं। किन्तु सब आपके हाथ में ही है। आपको अपने जीवन को किस ओर ले कर जाना यह कोई दूसरा निर्धारित नहीं करता। गाड़ी आपकी है, ड्राईवर आप हैं, मंजिल आपने चुननी हैं, रास्ता आपने बनाना है।
कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता। बस मतभेद होते हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है : "Blaming others is excusing ourse

अच्छे दिन कब आयेंगे ?

ट्रेन की पटरियों पर हगने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आएंगे ?
शहरों में रोड किनारे मूतने वाला महिलाओं की निजता का ख्याल ना रखने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सड़कों पर कचरा फैलाने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
तहसीलों में कभी भी समय पर ना आने वाला सरकारी कर्मचारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पैसों के बिना आय प्रमाण पत्र ,जाति प्रमाण पत्र ,मूल निवास प्रमाण पत्र ना बनाने वाला लेखपाल पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी अस्पतालों में बिना पैसे के गरीब का इलाज ना करने वाला डॉक्टर पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी विद्यालयों में मोटी रकम ऐंठकर भी बच्चों को ठीक से शिक्षा ना देने वाला शिक्षक पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
गाड़ी के कागज़ पूरे होने पर भी चालान काटने की धमकी देकर रोकड़ा ऎंठने वाला पुलिस वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
शहर में आये हुये नए इंसान से दुगना ,तिगुना किराया बसूलने वाला टेम्पू चालक पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
घर में ठाली निठल्ले रहने वाला काम न करने वाला कामचोर पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
लड़कियों को गंदी नजर से देखने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
बच्चियों और 90 साल तक की बूढी औरतों को हवस का शिकार बनाने वाला बलात्कारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
नयी फिल्मो को मॉल में जाकर देखकर करोड़ों उड़ाने वाला युवा पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पढ़ाई से दूर भागने वाला छात्र् पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सड़कों पर भीख मागने वाले लूले अपाहिजों की मदद न करने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी कॉलिज के गेट के सामने सरकारी नौकरियों के फ़र्ज़ी फॉर्म बेचकर बेरोजगारों से रुपये ऎंठने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
मेट्रों स्टेशन में नए यात्री को टोकन देने वाला रुपयों के जंजाल में उलझाकर कम रुपये वापस करने वाला कर्मचारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
शुद्ध दूध में तालाबों का गन्दा पानी मिलाकर शहरों में दूध बेचने वाला दूधिया पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पेट्रोल पम्प पर कम पेट्रोल देने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
अपने बूढे माँ बाप को बोझ समझकर सड़कों किनारे फेंकने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
अच्छे दिन चाहने वाले सभी भाई बहन बतायें कि उन्हें किस तरह के अच्छे दिन चाहिए ?
नोट : ऊपर लिखा हुआ लेख लेखक ने अपने खुद के अनुभव के आधार पर लिखा है |

शोषित समाज के लिए विचारों का पुंज छोड़ गए डा. अम्बेडकर

दमन के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक डाॅ. भीमराव अंबेडकर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायक है। विषमतावादी समाज में गैर बराबरी, भेदभाव, छुआछूत के विरूद्ध डाॅ. अम्बेडकर ने लोकतांत्रिक एवं वैधानिक रूप से संघर्ष किया। इसके चलते सदियों से अपने अधिकारों से वंचित वर्ग को न्याय मिला। डाॅ अंबेडकर की आधुनिक सोच की झलक भारतीय संविधान में देखने को मिलती है। अम्बेडकर ने दलितों, महिलाओं के अधिकारों को स्थापित करने के साथ-साथ अंधविश्वास, पाखंड और जाति वर्गभेद के विरूद्ध भी संघर्ष किया। डाॅ. अम्बेडकर की प्रगतिवादी सोच को रूढि़वादियों ने आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की। उनके योगदान को कमतर आंकने की भूल और उनके विचारों को न समझने की कमजोरी से देश की सामाजिक-व्यवस्था को विश्वमंच पर अपमान झेलना पड़ता है। यदि अंबेडकर के विचारों से प्रेरणा लेकर लोकतांत्रिक सरकारों ने कार्य किया होता तो देश की दो तिहाई आबादी को भी व्यवस्था में पूर्ण भागीदारी मिल गई होती।

क्या एकमात्र डिग्री ही योग्यता का पैमाना है ??

 राजनेताओं की शिक्षा हमारे यहाँ सदैव से चर्चा और विवादों का विषय बनती है। यद्यपि संविधान इस सम्बन्ध में मौन है, पर किसी के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या मंत्री बनते ही लोग उनकी योग्यता को उनकी शिक्षा और डिग्री से आंकने लगते हैं।
पर हम अपने इर्द गिर्द ध्यान से देखें तो तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति अपने से निम्न शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के अधीन कार्य कर रहे हैं। तो क्या यह उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह है ? भारत की सबसे बड़ी सरकारी सेवा आईएस और एलाइड सेवाओं में न्यूनतम योग्यता स्नातक मात्र है और वे अपने विभागों में सर्वोच्च पदों पर बैठते हैं, जबकि कई बार उनके अधीन कार्य करने वाले बड़े-बड़े डिग्रीधारी होते हैं। सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ की लड़ाई लम्बे समय से व्यवस्था में चल रही है।
तमाम व्यवसायी ऐसे मिलेंगे, जो बमुश्किल ही कोई बड़ी डिग्री लिए हों, पर एमबीए की डिग्री वाले उनके अधीन कार्य करते हैं।
जिन क्रिकेटर्स और फिल्म स्टार्स की एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते हैं और उनका एक अदद ऑटोग्राफ लेने के लिए ताक लगाये बैठते हैं, उनमें से कई हाईस्कूल फेल हैं।
यदि डिग्री ही योग्यता का पैमाना होती तो चपरासी, एमटीएस या पोस्टमैन बनने के लिए MBA, BTech, MTech, व PHD अभ्यर्थी लाइन में न लगे रहते।
मात्र डिग्री ही योग्यता का पैमाना होती तो सचिन तेंदुलकर न कभी क्रिकेट के भगवान बन पाते और न नरेंद्र मोदी जी सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री होते !!

नदी में पैसे नहीं डालने चाहिए।

"अर्थव्यवस्था पर भारी आस्था" एक लेख ! हमारे देश में रोज न जाने कितनी रेलगाडियां न जाने कितनी नदियों को पार करती हैं और उनके यात्रियों द्वारा हर रोज नदियों में सिक्के फेकने का चलन । अगर रोज के सिक्को के हिसाब से गढ़ना की जाये तो ये रकम कम से कम दहाई के चार अंको को तो पार करती होगी । सोचो अगर इस तरह हर रोज भारतीय मुद्रा ऐसे फेक दी जाती इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुँचता होगा ? ये तो एक अर्थशास्त्री ही बता सकता । लेकिन एक रसायनज्ञ होने के नाते ये जरूर लोगों को सिक्के की धातु के बारे में जागरूक कर सकता हूँ । वर्तमान सिक्के 83% लोहा और 17 % क्रोमियम के बने होते है । आप सबको ये बता हूँ कि क्रोमियम एक भारी जहरीली धातु है । क्रोमियम दो अवस्था में पाया जाता है, एक Cr (III) और दूसरी Cr (IV) । पहली अवस्था जहरीली नही मानी गई बल्कि क्रोमियम (IV) की दूसरी अवस्था 0.05% प्रति लीटर से ज्यादा हमारे लिए जहरीली है । जो सीधे कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को जन्म देती है । सोचो एक नदी जो अपने आप में बहुमूल्य खजाना छुपाये हुए है और हमारे एक दो रूपये से कैसे उसका भला हो सकता है ? सिक्के फेकने का चलन तांबे के सिक्के से है । एक समय मुगलकालीन समय में दूषित पानी से बीमारियां फैली थी । तो ,राजा ने प्रजा के लिए ऐलान करवाया कि हर व्यक्ति को अपने आसपास के जल के स्रोत या जलाशयों में तांबे के सिक्के को फेकना अनिवार्य कर दिया । क्योंकि तांबा जल को शुद्ध करने वाली सबसे अच्छी धातु है । आजकल सिक्के नदी में फेकने से उसके ऊपर किसी तरह का उपकार नही बल्कि जल प्रदूषण और बीमारियों को बढ़ावा दे रहे है । इसलिए आस्था के नाम पर भारतीय मुद्रा को हो रहे नुकसान को रोकने की जिम्मेदारी हम सब नागरिकों की है ।
अपने नजदीकी और परिचितों को सिक्के के बदले ताम्बे के टुकड़े ,नदी या जलस्रोत में डालने को कहे।
रुपे नदी में डालने से कोई फायदा नही है l

भ्रष्टाशचार मिटाने की शुरुआत खुद से...

आज सारी दुनिया जिस मुल्क को, जिस मुल्क की तरक़्क़ी को आदर और सम्मान के साथ देख रही है, वह भारत है. लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान में सब कुछ मिलता है, जी हां हमारे पास सब कुछ है. लेकिन हमें यह कहते हुए शर्म भी आती है और अफ़सोस भी होता है कि हमारे पास ईमानदारी नहीं है. हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भ्रष्टाचार कितनी गहराई तक उतर चुका है और किस तरह से बेईमानी एक राष्ट्रीय मजबूरी बनकर हमारी नसों में समा चुकी है महंगाई, ग़रीबी, भूख और बेरोज़गारी जैसे अहम मुद्दों से रोज़ाना और लगातार जूझती देश की अवाम के सामने भ्रष्टाचार इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा और सबसे खतरनाक बीमारी है. अगर इस बीमारी से हम पार पा गए तो यकीन मानिए सोने की चिड़िया वाला वही सुनहरा हिंदुस्तान एक बार फिर हम सबकी नजरों के सामने होगा. पर क्या ऐसा हो पाएगा? क्या आप ऐसा कर पाएंगे? मंदिर में दर्शन के लिए, स्कूल अस्पताल में एडमिशन के लिए, ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए, राशनकार्ड, लाइसेंस, पासपोर्ट के लिए, नौकरी के लिए, रेड लाइट पर चालान से बचने के लिए, मुकदमा जीतने और हारने के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए, कांट्रैक्ट लेने के लिए, यहां तक कि सांस लेने के लिए भी आप ही तो रिश्वत देते हैं. अरे और तो और अपने बच्चों तक को आप ही तो रिश्वत लेना और देना सिखाते हैं. इम्तेहान में पास हुए तो घड़ी नहीं तो छड़ी.अब आप ही बताएं कि क्या गुनहगार सिर्फ नेता, अफसर और बाबू हैं? आप एक बार ठान कर तो देखिए कि आज के बाद किसी को रिश्वत नहीं देंगे. फिर देखिए ये भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी कैसे खत्म होते हैंआंकड़े कहते हैं कि 2009 में भारत में अपने-अपने काम निकलवाने के लिए 54 फीसदी हिंदुस्तानियों ने रिश्वत दी. आंकड़े कहते हैं कि एशियाई प्रशांत के 16 देशों में भारत का शुमार चौथे सबसे भ्रष्ट देशों में होता है. आंकड़े कहते हैं कि कुल 169 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में हम 84वें नंबर पर हैं. आंकड़े ये भी बताते हैं कि 1992 से अब तक यानी महज 24 सालों में देश के 82 लाख करोड़ रुपए घोटाले की भेंट चढ़ गए. इतनी बड़ी रकम से हम 2 करोड़ 40 लाख प्राइमरी हेल्थसेंटर बना सकते थे. करीब साढ़े 14 करोड़ कम बजट के मकान बना सकते थे. नरेगा जैसी 90 और स्कीमें शुरू हो सकती थीं. करीब 61 करोड़ लोगों को नैनो कार मुफ्त मिल सकती थी. हर हिंदुस्तानी को 56 हजार रुपये या फिर गरीबी की रेखा से नीचे रह रहे सभी 40 करोड़ लोगों में से हर एक को एक लाख 82 हजार रुपये मिल सकते थे. यानी पूरे देश की तस्वीर बदल सकती थी I

जो हमारे भाई गाँव, जनपद एवं प्रदेश से दूर है उनके लिए-

वक़्त का ये परिंदा रुका है कहाँ
मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा |

लौटता था मैं जब पाठशाला से घर
अपने हाथों से खाना खिलती थी माँ
रात में अपनी ममता के आँचल तले
थपकीयाँ मुझे दे के सुलाती थी माँ ||
सोच के दिल में एक टीस उठती रही
रात भर दर्द मुझको जागता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा ||
सबकी आँखों में आँसू छलक आए थे
जब रवाना हुआ था शहर के लिए
कुछ ने माँगी दुआएँ की मैं खुश रहूं
कुछ ने मंदिर में जाके जलाए दिए ||
एक दिन मैं बनूंगा बड़ा आदमी
ये तसव्वुर उन्हें गुदगुदाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा ||
माँ ये लिखती हर बार खत में मुझे
लौट आ मेरे बेटे तुझे है क़सम
तू गया जबसे परदेस बेचैन हूँ
नींद आती नहीं भूख लगती है कम ||
कितना चाहा ना रोऊँ मगर क्या करूँ
खत मेरी माँ का मुझको रुलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा ||

सच्चा ज्ञान ही मनुष्य बनने का मूल मंत्र !

शास्त्र कहता है.....ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कोई जन्म से नहीं होता और न ही जन्म से कोई उच और नीच होता है, और ये भी कहता है कि जन्म से तो सभी शूद्र होता है .....
....तो फिर आज कोई कैसे जन्म से ही ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य हो जाता है?
क्या ऐसे लोग वेदोँ को मानते हैं ?
अगर नहीं तो फिर वेदिक धर्म को मानते हैं??
कतई नहीं...
सिर्फ एक ही धर्म को मानते हैं...बेईमानी, झूठ, व्यभिचार...
जिससे कायम रहे उनकी भय,भुत और भ्रम पर आधारित क्षद्म धार्मिक सत्ता जो धर्म के नाम पर आधारित क्रमिक असमानता कायम रखने के लिए अधार्मिक सत्ता है।
ऐसे लोग धार्मिक नहीं अधर्मी हैं?
सात्विक नहीं बेईमान और व्यभिचारी हैं।
क्योंकि सही ज्ञान पर सबों का जन्म से बराबरी का अधिकार हो यही धर्म है।
सबों को सम्मान से जीने का एक समान अधिकार हो यही धर्म है.....
अर्थात सत्य के राह पर चलकर सबों को उनका बराबरी का अधिकार मिले यही सच्चा धर्म है।
सच्चा ज्ञान ही मनुष्य बनने का मूल मंत्र!

मार्टिन लूथर ने कहा था...

मार्टिन लूथर ने कहा था...
"अगर तुम उड़ नहीं सकते तो, दौड़ो !
अगर तुम दौड़ नहीं सकते तो, चलो !
अगर तुम चल नहीं सकते तो, रेंगो !
पर आगे बढ़ते रहो !"
अपनी सोच ओर दिशा बदलो
सफलता आपका स्वागत करेंगी.......
रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है..
लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अंदर एक भी कंकड़ हो तो एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम भी चलना मुश्किल है ।।
यानी -
"बाहर की चुनोतियों से नहीं हम अपनी अंदर की कमजोरियों से हारते हैं"

इंसान वही है जो समाज की भी चिंता करे

सब्जी खरीदते समय जाति नहीं देखी जाती मगर उसी सब्जी को खिलाते समय जाति देखी जाती हैं।।
फसल कटाई पर जाति नहीं देखते मगर उसकी बनी रोटिया खिलाते समय जाति देखी जाती हैं।।
मकान बनवाने के लिए जाति नहीं देखते मगर जब मकान बन जाये तो उसमे बैठाने के लिए जाति देखते हैं।। मंदिर बनवाने के लिए जाति नहीं देखते मगर उसमें जाने के लिए जाति देखते हैं।।
स्कूल या कॉलेज बनवाने के लिए जाति नहीं देखते लेकिन पढ़ाई के वक़्त जाति देखी जाती हैं।।
कपडे खरीदते समय जाति नहीं देखते मगर उन्ही कपड़ो को पहनकर उनसे दूर भागते हैं। साथियो ये भारत देश हैं, जहाँ कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि जाति व्यवस्था खत्म हो गई है। बुद्धिजीवियों का सामाजिक दायित्व... "इंसान जीता है,पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंततः मर जाता हैं। जीता इसलिए है ताकि कमा सके... कमाता इसलिए है ताकि खा सके... खाता इसलिए है ताकि जिन्दा रह सके... लेकिन फिर भी एक दिन मर ही जाता है... अगर सिर्फ मरने के डर से कमाकर खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जायेगी। मरना तो सबको एक दिन हैं ही, नहीं तो समाज के लिए जियो, ज़िन्दगी का एक उद्देश्य बनाओं, गुलामी की जंजीरो में जकड़े समाज को आज़ाद कराओं। अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण तो एक जानवर भी कर लेता हैं। मेरी नज़र में इंसान वही है जो समाज की भी चिंता करे और समाज के लिये कार्य भी करे नहीं तो डूब मरे बेशक अगर जिंदगी सिर्फ खुद के लिये ही जी रहे है तो"...