गांवो में ओखल-मूसल तथा ढेँका चावल कूटने के मशीन हुआ करते थे।ओखल-मूसल तो प्रायः प्रत्येक घर में होता था लेकिन ढेँका किसी-किसी के घर में होता था। ओखल-मूसल से कम मात्रा में धान से चावल बन पाता था लेकिन ढेँका से अधिक मात्रा में चावल बनता था।मेरे घर में तो दोनों था,ओखल-मूसल भी और ढेँका भी।
शुरुवाती दिनों(बचपन) में मैंने तो दोनों चलाया, ओखल-मूसल भी और ढेँका भी।पहले जब गांव में राईस मिलें या आटा चक्कियां नही थीं तो घर-घर जांता,चकरी, ओखल-मूसल तथा ढेँका हुआ करते थे। घर की औरतें 2 बजे रात से ही सुबह बनाने के लिए चावल कूटना और आटा पीसना शुरू कर देती थीं।इन कार्यों को करने के लिए घर की औरतें बाकायदा कुटाई, पिसाई का गीत बनाये हुए थीं और पूरे लय से गाती थीं।
वे भी क्या दिन थे जब कितनी कठिन मेहनत के बाद आटा और चावल बन पाता था। किसी साथी ने ढेँका का फोटो पोस्ट किया है जिसे देखकर छप्पर का घर,मिट्टी का चूल्हा,ढेँका और ओखल-मूसल से धान की कुटाई, जाँत से आटे की पिसाई बरबस याद आ गयी जो अब इतिहास हो चुका है। शायद हम सबके बच्चे न पहचान सकेंगे और न यह सोच भी पाएंगे कि कुछ ही वर्षों पूर्व ये सब हम सबके घर के आवश्यक उपकरण थे।


0 comments:
Post a Comment