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Wednesday, August 24, 2016

हां मैं हिन्दू हूँ...

संघियों मैं हिन्दू हूँ बाकायदा हिन्दू हूँ, स्वामी विवेकानंद वाला हिन्दू हूँ, आदर्शो के लिए और बुराई से लड़ने के लिए राजपाट छोड़ देने वाले राम वाला हिन्दू हूँ, न्याय के लिए भारत को महाभारत बना देने वाले कृष्ण वाला हिन्दू हूँ., सभी को अपनाने वाले कृष्ण वाला हिन्दू हूँ, गरीब गुरबा सभी को साथ रखने वाले शिव वाला हिन्दू हूँ, सैकड़ो साल तमाम तरह की गुलामी के बाद भी सर उठा कर खड़े रहने और न मिटने वाला हिन्दू हूँ, हाँ मैं हिन्दू हूँ पर ----संघियों मैं तुम्हारे जैसा हिन्दू नहीं हूँ | मैं हिन्दुओ को मिलावट का जहर खिलने वाला हिन्दू नहीं हूँ,, मैं हिन्दुओ से मुनाफाखोरी और जमाखोरी करने वाला हिन्दू नहीं हूँ ,,, महान संघियों मेरे लहू से सभी कौमो की जान बाख जाती है मैं लाल खून वाला हिन्दू हूँ,,, मेरा खून केसरियां नहीं है संघियों और हरा भी नहीं है |
मैं सबको अपनाने वाला हिन्दू हूँ ,मैं प्यार बांटने वाला हिन्दू हूँ ,,हाँ मैं तुम्हारी तरह नफ़रत नहीं कर सकता संघियों पर मैं हिन्दू हूँ , हाँ मैं हिन्दू हूँ और इंसान होते हुए ही हिन्दू हूँ |

मैं तुम्हारी तरह जेहादी नहीं हूँ,, मैं तुम्हारी तरह दीवारे खड़ी करने वाला नहीं हूँ, मैं तुम्हारी तरह इस्राइल और फिलिस्तीन नहीं बनाना चाहता हूँ हिंदुस्तान को, मैं नामीबिया नहीं बनाना चाहता हूँ हिन्दुस्तान को | मैं हिंदुस्तान को वही बनाये रखना चाहता हूँ जहा आज़ादी की लड़ाई हो या सीमा के बाहर या अन्दर युद्ध और आपदा हो तो पूरा हिंदुस्तान साथ खड़ा होता है मैं तुम्हारी तरह वो हिंदुस्तान नहीं बनना चाहता हूँ जिसमे खानों में बंटा हो देश और समाज |

हम मैं एलान करता हूँ की मैं सच्चा हिन्दू हूँ | तुम कर सको तो बेदखल कर दो मुझे हिन्दू जमात से या हिन्दुस्तान से नकली हिन्दुओ पर मैं अंगद के पैर की तरह मजबूती से अपनी इंसानियत की जमीन पर खड़ा हुआ हिन्दू हूँ |

हम मैं ही असली हिन्दू हूँ संघियों |


Monday, July 4, 2016

कभी मेरे बेटे कचहरी न जाना

कभी मेरे बेटे कचहरी न जाना
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना- कचहरी न जाना.
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे है
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||

हथकड़ी लगाना सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना है I

सम्पूर्ण देश में नित्य प्रति कचहरी परिसर के आस पास पुलिस अभिरक्षा में व्यक्तियों के हाथ में हथकड़ी और उसकी रस्सी पकड़े पुलिस कर्मियों को देखकर किसी को अचरज नही होता। सभी इसे एक सामान्य आवश्यक पुलिसिया कार्यवाही मानते है। न्यायिक अधिकारियों के सामने भी हथकड़ी पहने लोगों को प्रस्तुत किया जाता है और उसी दशा उन्हें सुनवाई के दौरान न्यायालय कक्ष में खड़ा रखा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अमानवीय अतार्किक उत्पीड़क और संविधान के अनुच्छेद 19 एवं 21 के प्रतिकूल घोषित किया है।

आजादी के पहले अंग्रेज पुलिस अधिकारी भारतीयों की गरिमा और सम्मान को धूल धूसरित करने के दुरासय से हथकड़ी बेड़ी पहनाकर उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया करते थे और इससे उनका अहं संतुष्ट होता था। उन्होंने अपनी इस अमानवीय कार्यवाही को विधि सम्मत बताने के लिए पुलिस अधिनियम में इसके लिए नियम भी बना लिये थे। अंग्रेजों के बनाये नियमो का अनुचित सहारा लेकर हरियाणा पुलिस ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति श्री ए0एस0 बैन्स को हथकड़ी पहनाकर थाने से न्यायालय लाने का दुस्साहर किया था। उच्च न्यायालय ने पुलिस की इस कार्यवाही को अमानवीय बताते हुये राज्य सरकार के विरूद्ध पेनाल्टी अधिरोपित की और पचास हजार रूपये बतौर क्षतिपूर्ति देने का आदेश पारित किया है। इस प्रकार के कई आदेशों के बावजूद सम्पूर्ण देश में स्थानीय थाना स्तरों पर पुलिस अभिरक्षा में गिरफ्तार व्यक्तियों को हथकड़ी पहनाना और फिर उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैदल ले जाना नित्य प्रति की सामान्य कार्यवाही है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कृष्णा अय्यर ने सुनील बत्रा बनाम देलही एडमिनिस्ट्रेशन (ए.आई.आर-1978 सुप्रीम कोर्ट पेज 1678) के द्वारा सम्पूर्ण देश में जारी इस प्रथा को अमानवीय घोषित किया है। उन्होंने प्रतिपादित किया है कि हथकड़ी पहनाने से व्यक्ति की मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है। इसके बाद प्रेमशंकर शुक्ला बनाम देलही एडमिनिस्ट्रेशन (ए.आई.आर-1980-एसी.सी. पेज 540) में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेशात्मक दिशा निर्देश जारी किये। कहा गया कि गिरफ्तार व्यक्ति को हथकड़ी पहनाना अनुच्छेद 19 एवं 21 का उल्लंघन है। हथकड़ी पहनाकर गिरफ्तार व्यक्तियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना अमानवीय अपमानजनक और उत्पीड़क है। इससे मानवाधिकारों का हनन होता है और व्यक्ति की मानवीय गरिमा धूल धूसरित हो जाती है। निर्णय में कहा गया है कि हथकड़ी के बिन्दु पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा निर्देशों के बाद जो कोई भी  किसी को हथकड़ी पहनाकर पुलिस अभिरक्षा में कहीं ले जाता हुआ पाया जाता है तो माना जायेगा कि उसने न्यायालय के आदेश की अवमानना की है और उसे विधि के अन्य प्रावधानों के साथ साथ न्यायालय अवमान अधिनियम के तहत दण्डित किया जायेगा।
सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों और आदेशात्मक दिशा निर्देशों के बावजूद पुलिस अभिरक्षा में व्यक्तियों को हथकडी पहनाकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रथा आज भी बेरोकटोक जारी है। स्थानीय स्तरो पर थाने या जेल में हथकड़ी पहनाकर लोगों को अपमानित करने पर कोई अंकुश नही लग सका है। मेडिकल कालेज के कुछ छात्रों को हथकड़ी लगाये जाने के विरोध में डाक्टरों की देशव्यापी हड़ताल का भी इस अमानवीय प्रथा पर कोई प्रभाव नही पड़ा है। आपातकाल के दौरान उस समय के प्रख्यात समाजवादी श्रमिक नेता श्री जार्ज फर्नाडीज को हथकड़ी पहनाकर सुप्रीम कोर्ट लाया जाता था। हरियाणा में मुख्यमन्त्री देबी लाल ने अपनी व्यक्तिगत खुन्नस के चलते निवर्तमान मुख्यमन्त्री चैधरी वंशी लाल को हथकड़ी पहनावाकर सड़क पर घुमवाया था। इस प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि अब पुलिस अभिरक्षा में हथकड़ी सुरक्षा कारणो से नही पहनाई जाती है बल्कि पुलिस कर्मियों की सुविधा और अहं की संतुष्टि के लिए इस प्रथा को जारी रखा जा रहा है। सार्वजनिक मुद्दों पर धरना प्रदर्शन करने वाले आन्दोलकारी स्वयं अपनी गिरफ्तारी देते है और किसी भी दशा में पुलिस अभिरक्षा से उनके भागने की कोई सम्भावना नही होती फिर भी उन्हें थाने या जेल से न्यायालय हथकड़ी पहनाकर ही लाया जाता है। खेत मजदूर चेतना संघ बनाम स्टेट आफ मध्य प्रदेश (ए.आई.आर.-1995 एस.सी.-पेज 31) में सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक मुद्दो पर धरना या प्रदर्शन करने वाले आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारी और उन्हें हथकड़ी लगाने की घटना पर राज्य सरकार के साथ साथ सम्बन्धित न्यायिक अधिकारी को भी फटकार लगाई थी।
आम लोगों को शोषण, अत्याचार, अन्याय, अपराध और अपराधियों से बचाना और उनकी रक्षा करना पुलिस का पवित्र कर्तव्य है। भ्रष्टाचार और अपने आपको शासक मानने की सामन्ती प्रवृत्ति के कारण सम्पूर्ण देश में पुलिस कर्मियों ने आम लोगों की रक्षा करने के अपने पवित्र कर्तव्य का परित्याग कर दिया है और खुद आम लोगों के उत्पीड़न का कारण बन गये है। आम आदमी पुलिस अभिरक्षा से भागने या अभिरक्षा के दौरान पुलिस कर्मियों को कोई क्षति पहुँचाने के बारे में सोच भी नही सकता। पुलिस कर्मियों की मिली भगत और भ्रष्टाचार के कारण अपराधी पुलिस अभिरक्षा से भागने में सफल होते है। भागने के अवसर स्वयं पुलिस कर्मी उन्हें उपलब्ध कराते है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के विरूद्ध गम्भीर आरोप होना या गम्भीर धाराओं मे ज्यादा मुकदमें दर्ज होना हथकड़ी पहनाने का आधार नही हो सकता। स्वतन्त्र भारत में हथकड़ी पहनाने का कोई नियम नही है। हथकड़ी अपवाद स्वरूप ही पहनाई जायेगी। सुनील गुप्ता बनाम स्टेट आफ मध्य प्रदेश (1990-एस.सी.सी. क्रिमिनल -पेज 441) में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया है कि गिरफ्तार व्यक्ति यदि खतरनाक है और पुलिस अभिरक्षा के दौरान उसके भाग जाने की सम्भावना प्रतीत होती है तो उसे थाने से मजिस्टेªट के समक्ष लाये जाने के लिए हथकड़ी पहनाने के पूर्व सम्बन्धित अधिकारी को थाने की डायरी में हथकड़ी पहनाने के कारणों को अभिलिखित करना होगा और अन्य कागजातों के साथ इसकी प्रति भी मजिस्टेªट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। न्यायालय को गिरफ्तार व्यक्ति के भाग जाने की सम्भावना के बारे में सम्पूर्ण तथ्यों से अवगत कराना होगा और फिर न्यायिक अधिकारी के आदेश के अधीन हथकड़ी पहनाई जा सकती है, परन्तु पुलिस या जेल अधिकारियो को अपने मन से अपने स्तर पर किसी को भी हथकड़ी पहनाने के लिए निर्णय लेने का कोई अधिकार किसी विधि के तहत प्राप्त नही है। विभिन्न राज्यों में अंग्रेजों के बनाये पुलिस अधिनियमों में हथकड़ी पहनाने के प्रावधान थे जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री कृष्णा अय्यर द्वारा पारित निर्णय के बाद स्वतः निष्प्रभावी हो गये है और अब उनका कोई विधि अस्तित्व नही है। हथकड़ी पहनाने की कार्यवाही अब पूरी तरह विधिविरूद्ध और संविधान के अनुच्छेद 19 एवं 21 के प्रतिकूल घोषित कर दी गयी है तद्नुसार उसे किसी भी दशा में जारी नही रखा जा सकता है।
प्रायः देखा जाता है कि अस्पतालों में इलाज के दौरान बीमार बन्दियों को भी हथकड़ी पहनाकर रखा जाता है। सिटीजन आफ डेमोक्रेसी बनाम स्टेट आफ आसाम (ए.आई.आर-1996-एस.सी.- पेज 197) के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने अस्पताल में बीमार बन्दियों को हथकड़ी बेड़ी लगाकर रखे जाने की घटना को अन्तर्राष्ट्रीय विधि के तहत सभी को प्राप्त मानवाधिकारो का उल्लंघन बताया है। इस निर्णय के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया है कि देश के किसी भी भाग में दोषी या विचाराधीन किसी भी प्रकार के बन्दी को हथकड़ी पहनाकर अस्पताल में रखना, एक जेल से दूसरी जेल स्थानान्तरित करना या जेल से न्यायालय लाना आम लोगों को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों के प्रतिकूल है, परन्तु सर्वोच्च न्यायालय की इस उद्घोषणा या इसके पूर्व जारी आदेशात्मक दिशा निर्देशों का स्थानीय स्तर पर पालन नही किया जा रहा है और सम्बन्धित न्यायिक अधिकारी से अनुमति प्राप्त किये बिना नित्य प्रति गिरफ्तार व्यक्तियों को पुलिस अभिरक्षा में हथकड़ी पहनाकर लाया जाता है और हथकड़ी लगाये रखकर न्यायिक अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत भी किया जाता है। एलटेमेस एडवोकेट बनाम यूनियन आफ इण्डिया आदि मे देलही हाई कोर्ट ने सरकार को हथकड़ी के सम्बन्ध में स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने के लिए आदेशित किया है परन्तु केन्द्र सरकार या राज्य सरकारो ने इस दिशा में अपने स्तर पर अभी तक कोई पहल नही की है। सरकारो का यही रवैया पुलिस कर्मियों और जेल अधिकारियों को मनमानी करने की छूट देता है।

आम लोगों के प्रति असंवेदनशील रवैये के कारण पुलिस कर्मी या जेल अधिकारी अपनी अभिरक्षा में बन्दियों को मनुष्य नही मानते और हथकड़ी बेड़ी रस्सी में उसे बाँधकर लाने ले जाने में गर्व महसूस करते है। दुःखद सच्चाई है बन्दियों के मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा निर्देश थाने या जेल की चैखट पर दम तोड़ देते है। किसी को हथकड़ी पहनाकर थाने या जेल से न्यायालय लाना न्यायालय की अवमानना की परिधि में आता है परन्तु अभी तक किसी पुलिस कर्मी या जेल अधिकारी के विरूद्ध न्यायालय अवमान अधिनियम के तहत कार्यवाही नही की गई है।

चावल कूटने का ढेंका....

गांवो में ओखल-मूसल तथा ढेँका चावल कूटने के मशीन हुआ करते थे।ओखल-मूसल तो प्रायः प्रत्येक घर में होता था लेकिन ढेँका किसी-किसी के घर में होता था। ओखल-मूसल से कम मात्रा में धान से चावल बन पाता था लेकिन ढेँका से अधिक मात्रा में चावल बनता था।मेरे घर में तो दोनों था,ओखल-मूसल भी और ढेँका भी।
शुरुवाती दिनों(बचपन) में मैंने तो दोनों चलाया, ओखल-मूसल भी और ढेँका भी।पहले जब गांव में राईस मिलें या आटा चक्कियां नही थीं तो घर-घर जांता,चकरी, ओखल-मूसल तथा ढेँका हुआ करते थे। घर की औरतें 2 बजे रात से ही सुबह बनाने के लिए चावल कूटना और आटा पीसना शुरू कर देती थीं।इन कार्यों को करने के लिए घर की औरतें बाकायदा कुटाई, पिसाई का गीत बनाये हुए थीं और पूरे लय से गाती थीं।
वे भी क्या दिन थे जब कितनी कठिन मेहनत के बाद आटा और चावल बन पाता था। किसी साथी ने ढेँका का फोटो पोस्ट किया है जिसे देखकर छप्पर का घर,मिट्टी का चूल्हा,ढेँका और ओखल-मूसल से धान की कुटाई, जाँत से आटे की पिसाई बरबस याद आ गयी जो अब इतिहास हो चुका है। शायद हम सबके बच्चे न पहचान सकेंगे और न यह सोच भी पाएंगे कि कुछ ही वर्षों पूर्व ये सब हम सबके घर के आवश्यक उपकरण थे।

Monday, March 7, 2016

नेताओं से बहुत दुखी है...

आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,
शैतानी शैतान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,
घोटालों की थाली में।
सूटकेश भर के चलते हैं,
अपने यहाँ दलाली में।।
देश-धर्म की नहीं है चिंता,
चिन्ता निज सन्तान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की !
भिखमंगों में गिनती कर दी,
भारत देश महान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
जनता केआवंटित धन को,
आधा मन्त्री खाते हैं।
बाकी में अफसर-ठेकेदार,
मिलकर मौज उड़ाते हैं।।
लूट-खसोट मचा रखी है,
सरकारी अनुदान की।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की।।
थर्ड क्लास अफसर बन जाता,
फर्स्ट क्लास चपरासी है।
होशियार बच्चों के मन में,
छायी आज उदासी है।।
गंवार व्यक्ति तो नेता बन गया,
मेधावी आज खलासी है।
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,
शैतानी शैतान की।।
नेताओं से बहुत दुखी है,.
जनता हिन्दुस्तान की।।

Blaming others is excusing ourse

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये।
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥
कहते हैं मानव की सबसे बड़ी गलतफ़हमी है कि हर किसी को लगता है कि वो गलत नहीं है। यह दोहा हमारा व्यवहार हमें बता रहा है। जब भी हम दुखी होते हैं तो हमें लगता है कि हम फ़लाने व्यक्ति के कारण दुखी हैं.. उसने ऐसा कैसे कर दिया.. या ऐसा क्यों नहीं किया... या उसको वो करना चाहिये था। या परिस्थितियों को रोते हैं.. काश ऐसा हो जाता.. काश वैसा हो जाता.. वगैरह वगैरह। यह अमूमन हम सब करते हैं। यह मानवीय व्यवहार है। अपने दुख का दोषी किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को ठहराना। कभी क्रोध आ जाये तो हम उसका दोष भी किसी दूसरे को देते हैं। और हमें हमेशा लगता है कि हम सही हैं। हमसे कभी भूल नहीं हो सकती। ये हमारा अहं ही है जो हमे इस तरह सोचने पर मजबूर कर देता है। अपनी गलतियों का कारण हम दूसरों में खोजते हैं। नतीजा, हम किसी दूसरे की आलोचना करते हैं और उसे ही भला बुरा कहने लगते हैं।
कबीर कहते हैं कि क्यों व्यर्थ में हम किसी दूसरे में दोष ढूँढने लगते हैं? वे कहते हैं कि हमें अपने अंदर झाँक कर देखना चाहिये। यदि कहीं कोई कमी है तो वो "मुझमें" है। मैं किसी दूसरे व्यक्ति में गलतियाँ क्यों ढूँढू? यदि मैं किसी के साथ निभा नहीं पा रहा हूँ तो बदलाव मुझे करना है।
हाँ मैं यह जानता हूँ कि हर व्यक्ति चाहें वो हमेशा अच्छा लगे या बुरा, उसका प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। जिस व्यक्ति की आपसे नहीं निभती वही आपका व्यवहार की परीक्षा होती है कि आप उससे किस प्रकार बर्ताव करते हैं। किन्तु सब आपके हाथ में ही है। आपको अपने जीवन को किस ओर ले कर जाना यह कोई दूसरा निर्धारित नहीं करता। गाड़ी आपकी है, ड्राईवर आप हैं, मंजिल आपने चुननी हैं, रास्ता आपने बनाना है।
कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता। बस मतभेद होते हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है : "Blaming others is excusing ourse

अच्छे दिन कब आयेंगे ?

ट्रेन की पटरियों पर हगने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आएंगे ?
शहरों में रोड किनारे मूतने वाला महिलाओं की निजता का ख्याल ना रखने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सड़कों पर कचरा फैलाने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
तहसीलों में कभी भी समय पर ना आने वाला सरकारी कर्मचारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पैसों के बिना आय प्रमाण पत्र ,जाति प्रमाण पत्र ,मूल निवास प्रमाण पत्र ना बनाने वाला लेखपाल पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी अस्पतालों में बिना पैसे के गरीब का इलाज ना करने वाला डॉक्टर पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी विद्यालयों में मोटी रकम ऐंठकर भी बच्चों को ठीक से शिक्षा ना देने वाला शिक्षक पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
गाड़ी के कागज़ पूरे होने पर भी चालान काटने की धमकी देकर रोकड़ा ऎंठने वाला पुलिस वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
शहर में आये हुये नए इंसान से दुगना ,तिगुना किराया बसूलने वाला टेम्पू चालक पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
घर में ठाली निठल्ले रहने वाला काम न करने वाला कामचोर पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
लड़कियों को गंदी नजर से देखने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
बच्चियों और 90 साल तक की बूढी औरतों को हवस का शिकार बनाने वाला बलात्कारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
नयी फिल्मो को मॉल में जाकर देखकर करोड़ों उड़ाने वाला युवा पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पढ़ाई से दूर भागने वाला छात्र् पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सड़कों पर भीख मागने वाले लूले अपाहिजों की मदद न करने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
सरकारी कॉलिज के गेट के सामने सरकारी नौकरियों के फ़र्ज़ी फॉर्म बेचकर बेरोजगारों से रुपये ऎंठने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
मेट्रों स्टेशन में नए यात्री को टोकन देने वाला रुपयों के जंजाल में उलझाकर कम रुपये वापस करने वाला कर्मचारी पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
शुद्ध दूध में तालाबों का गन्दा पानी मिलाकर शहरों में दूध बेचने वाला दूधिया पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
पेट्रोल पम्प पर कम पेट्रोल देने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
अपने बूढे माँ बाप को बोझ समझकर सड़कों किनारे फेंकने वाला पूछता है कि अच्छे दिन कब आयेंगे ?
अच्छे दिन चाहने वाले सभी भाई बहन बतायें कि उन्हें किस तरह के अच्छे दिन चाहिए ?
नोट : ऊपर लिखा हुआ लेख लेखक ने अपने खुद के अनुभव के आधार पर लिखा है |